वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०३ · ४९ श्लोकाःSarga 103 · 49 ślokas

श्रीराम आदिका विलाप, पिताके लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन

पित्रे जलाञ्जलि

“पित्रे जलाञ्जलि”
॥ २ · १०३ · २५–२७ ॥

मन्दाकिन्याः निर्मले पुलिने जानुदघ्ने प्रवाहजले स्थिताः चत्वारः राघवभ्रातरः दिवंगताय पित्रे राज्ञे दशरथाय जलाञ्जलिं ददति; अग्रे श्यामसुन्दरः उच्चजटाधरो वल्कलधरो रामः दक्षिणाभिमुखः अश्रुमुखः अञ्जलिना विमलं तोयं क्षरन् 'एतत् ते राजशार्दूल अक्षयं तोयम्' इति विलपति, पार्श्वे लक्ष्मणः तथैव वल्कले अञ्जलिं जलपूर्णां गृह्णाति, पृष्ठतः श्वेतशोकवस्त्रधरौ निराभरणौ भरतशत्रुघ्नौ नतशिरसौ रुदन्तौ जलमर्पयतः, पुष्पिते तीरे च सरलवल्कवत्कार्पासवनवस्त्रधरा सीता आदरात् दूरे कृताञ्जलिः तूष्णीं रुदती तिष्ठति; प्रभातस्य मृदुशोकच्छायः प्रकाशः सलिलं रजतवत् द्योतयति।

मन्दाकिनी के निर्मल घाट पर घुटनों तक बहते जल में खड़े चारों रघुवंशी भाई स्वर्गवासी पिता महाराज दशरथ को जलाञ्जलि अर्पित कर रहे हैं; आगे श्यामसुन्दर श्रीराम — उलझी जटा ऊँचे बाँधे, कमर पर छोटा वल्कल और एक कंधे पर वल्कल-पट्टी धारण किये — दक्षिण दिशा की ओर मुख किये, अश्रुधारा बहाते, अञ्जलि से जल की उज्ज्वल धारा गिराते हुए 'हे राजशार्दूल! यह निर्मल जल आपको अक्षय रूप से प्राप्त हो' कहकर विलाप कर रहे हैं; उनके पास लक्ष्मण भी वैसे ही वल्कल में अञ्जलि भरकर जल चढ़ा रहे हैं; पीछे बिना रंगे श्वेत शोक-वस्त्र में, आभूषण उतारे और बिखरे केश लिये भरत और शत्रुघ्न सिर झुकाये, आँखों से आँसू बहाते जलाञ्जलि दे रहे हैं; फूलों से भरे तट पर कोरे कपास की सरल वनवासिनी साड़ी, माँग में सिन्दूर और लम्बी वेणी धारण किये सीता आदरपूर्ण दूरी पर हाथ जोड़े मौन आँसू बहाती खड़ी हैं; प्रातःकाल का कोमल शोक-रंजित प्रकाश जल को रजत-सा चमका रहा है और पीछे चित्रकूट का पुष्पित वन झिलमिलाता है।

In the clear shallows of the Mandakini below Chitrakut, the four brothers of the House of Raghu stand knee-deep in the flowing water, offering the jalanjali water-libation for their dead father, King Dasharath; in the foreground the blue-green Ram — matted hair bound high, a short bark valkala at his hips and a bark strip across one shoulder — faces the south with tears streaming, pouring a bright thread of water from his cupped palms as he laments 'may this pure, imperishable water reach you, O tiger among kings'; Lakshman beside him, likewise in bark, lifts his own cupped handful; a step behind, Bharat and Shatrughna in plain undyed white mourner's cloth, ornaments cast off and hair loose, bow their heads and offer water with streaming eyes; on the flowering bank Sita, in a simple cream forest sari with sindoor in her parting and a long braid, stands at a reverent distance with folded hands, silently weeping, while the soft grief-toned morning light silvers the water and the blossoming forest of Chitrakut shimmers behind them.

॥ २ · १०३ · १ ॥
तां श्रुत्वा करुणां वाचं पितुर्मरणसंहिताम्। राघवो भरतेनोक्तां बभूव गतचेतनः

tāṁ śrutvā karuṇāṁ vācaṁ piturmaraṇasaṁhitām।
rāghavo bharatenoktāṁ babhūva gatacetanaḥ ॥

भरत की कही हुई पिता की मृत्यु से सम्बन्ध रखनेवाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःख के कारण अचेत हो गये

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॥ २ · १०३ · २ ॥
तं तु वज्रमिवोत्सृष्टमाहवे दानवारिणा। वाग्वज्रं भरतेनोक्तममनोज्ञं परंतपः

taṁ tu vajramivotsṛṣṭamāhave dānavāriṇā।
vāgvajraṁ bharatenoktamamanojñaṁ paraṁtapaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · ३ ॥
प्रगृह्य रामो बाहू वै पुष्पिताङ्ग इव द्रुमः। वने परशुना कृत्तस्तथा भुवि पपात

pragṛhya rāmo bāhū vai puṣpitāṅga iva drumaḥ।
vane paraśunā kṛttastathā bhuvi papāta ha ॥

॥ २–३ ॥

भरत के मुख से निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्र ने युद्धस्थल में वज्र का प्रहार-सा कर दिया हो। मन को प्रिय न लगनेवाले उस वाग्-वज्र को सुनकर शत्रुओं को संताप देनेवाले श्रीराम दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वन में कुल्हाड़ी से कटे हुए उस वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े (भरत के दर्शन से श्रीराम को हर्ष हुआ था, पिता की मृत्यु के संवाद से दुःख; अतः उन्हें खिले और कटे हुए पेड़ की उपमा दी गयी है)

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॥ २ · १०३ · ४ ॥
तथा हि पतितं रामं जगत्यां जगतीपतिम्। कूलघातपरिश्रान्तं प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्

tathā hi patitaṁ rāmaṁ jagatyāṁ jagatīpatim।
kūlaghātapariśrāntaṁ prasuptamiva kuñjaram ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · ५ ॥
भ्रातरस्ते महेष्वासं सर्वतः शोककर्शितम्। रुदन्तः सह वैदेह्या सिषिचुः सलिलेन वै

bhrātaraste maheṣvāsaṁ sarvataḥ śokakarśitam।
rudantaḥ saha vaidehyā siṣicuḥ salilena vai ॥

॥ ४–५ ॥

पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वी पर गिरकर नदी के तट को दाँतों से विदीर्ण करने के परिश्रम से थककर सोये हुए हाथी के समान प्रतीत होते थे। शोक के कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीराम को सब ओर से घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओं के जल से भिगोने लगे

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॥ २ · १०३ · ६ ॥
तु संज्ञां पुनर्लब्ध्वा नेत्राभ्यामश्रुमुत्सृजन्। उपाक्रामत काकुत्स्थः कृपणं बहु भाषितुम्

sa tu saṁjñāṁ punarlabdhvā netrābhyāmaśrumutsṛjan।
upākrāmata kākutsthaḥ kṛpaṇaṁ bahu bhāṣitum ॥

थोड़ी देर बाद पुनः होश में आने पर नेत्रों से अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने अत्यन्त दीन वाणी में विलाप आरम्भ किया

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॥ २ · १०३ · ७ ॥
रामः स्वर्गतं श्रुत्वा पितरं पृथिवीपतिम्। उवाच भरतं वाक्यं धर्मात्मा धर्मसंहितम्

sa rāmaḥ svargataṁ śrutvā pitaraṁ pṛthivīpatim।
uvāca bharataṁ vākyaṁ dharmātmā dharmasaṁhitam ॥

पृथ्वीपति महाराज दशरथ को स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने भरत से यह धर्मयुक्त बात कही—॥

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॥ २ · १०३ · ८ ॥
किं करिष्याम्ययोध्यायां ताते दिष्टां गतिं गते। कस्तां राजवराद्धीनामयोध्यां पालयिष्यति

kiṁ kariṣyāmyayodhyāyāṁ tāte diṣṭāṁ gatiṁ gate।
kastāṁ rājavarāddhīnāmayodhyāṁ pālayiṣyati ॥

‘भैया! जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्या में चलकर अब मैं क्या करूँगा? उन राजशिरोमणि पिता से हीन हुई उस अयोध्या का अब कौन पालन करेगा?

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॥ २ · १०३ · ९ ॥
किं नु तस्य मया कार्यं दुर्जातेन महात्मनः। यो मृतो मम शोकेन मया संस्कृतः

kiṁ nu tasya mayā kāryaṁ durjātena mahātmanaḥ।
yo mṛto mama śokena sa mayā na ca saṁskṛtaḥ ॥

‘हाय! जो पिताजी मेरे ही शोक से मृत्यु को प्राप्त हुए, उन्हींका मैं दाह-संस्कारतक न कर सका। मुझ-जैसे व्यर्थ जन्म लेनेवाले पुत्र से उन महात्मा पिता का कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ?

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॥ २ · १०३ · १० ॥
अहो भरत सिद्धार्थो येन राजा त्वयानघ। शत्रुघ्नेन सर्वेषु प्रेतकृत्येषु सत्कृतः

aho bharata siddhārtho yena rājā tvayānagha।
śatrughnena ca sarveṣu pretakṛtyeṣu satkṛtaḥ ॥

‘निष्पाप भरत! तुम्हीं कृतार्थ हो, तुम्हारा अहोभाग्य है, जिससे तुमने और शत्रुघ्न ने सभी प्रेतकार्यों (पारलौकिक कृत्यों) में संस्कार-कर्म के द्वारा महाराज का पूजन किया है

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॥ २ · १०३ · ११ ॥
निष्प्रधानामनेकाग्रां नरेन्द्रेण विना कृताम्। निवृत्तवनवासोऽपि नायोध्यां गन्तुमुत्सहे

niṣpradhānāmanekāgrāṁ narendreṇa vinā kṛtām।
nivṛttavanavāso'pi nāyodhyāṁ gantumutsahe ॥

‘महाराज दशरथ से हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासक से रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अतः वनवास से लौटने पर भी मेरे मन में अयोध्या जाने का उत्साह नहीं रह गया है

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॥ २ · १०३ · १२ ॥
समाप्तवनवासं मामयोध्यायां परंतप। कोऽनुशासिष्यति पुनस्ताते लोकान्तरं गते

samāptavanavāsaṁ māmayodhyāyāṁ paraṁtapa।
ko'nuśāsiṣyati punastāte lokāntaraṁ gate ॥

‘परंतप भरत! वनवास की अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्या में जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्य का उपदेश देगा; क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये

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॥ २ · १०३ · १३ ॥
पुरा प्रेक्ष्य सुवृत्तं मां पिता यान्याह सान्त्वयन्। वाक्यानि तानि श्रोष्यामि कुतः कर्णसुखान्यहम्

purā prekṣya suvṛttaṁ māṁ pitā yānyāha sāntvayan।
vākyāni tāni śroṣyāmi kutaḥ karṇasukhānyaham ॥

‘पहले जब मैं उनकी किसी आज्ञा का पालन करता था, तब वे मेरे सद्व्यवहार को देखकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिये जो-जो बातें कहा करते थे, कानों को सुख पहुँचानेवाली उन बातों को अब मैं किसके मुख से सुनूँगा’

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॥ २ · १०३ · १४ ॥
एवमुक्त्वाथ भरतं भार्यामभ्येत्य राघवः। उवाच शोकसंतप्तः पूर्णचन्द्रनिभाननाम्

evamuktvātha bharataṁ bhāryāmabhyetya rāghavaḥ।
uvāca śokasaṁtaptaḥ pūrṇacandranibhānanām ॥

भरत से ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्रीरामचन्द्रजी पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नी के पास आकर बोले—

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॥ २ · १०३ · १५ ॥
सीते मृतस्ते श्वशुरः पितृहीनोऽसि लक्ष्मण। भरतो दुःखमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपतेः

sīte mṛtaste śvaśuraḥ pitṛhīno'si lakṣmaṇa।
bharato duḥkhamācaṣṭe svargatiṁ pṛthivīpateḥ ॥

‘सीते! तुम्हारे श्वशुर चल बसे। लक्ष्मण! तुम पितृहीन हो गये। भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथ के स्वर्गवास का दुःखदायी समाचार सुना रहे हैं’

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॥ २ · १०३ · १६ ॥
ततो बहुगुणं तेषां बाष्पं नेत्रेष्वजायत। तथा ब्रुवति काकुत्स्थे कुमाराणां यशस्विनाम्

tato bahuguṇaṁ teṣāṁ bāṣpaṁ netreṣvajāyata।
tathā bruvati kākutsthe kumārāṇāṁ yaśasvinām ॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन सभी यशस्वी कुमारों के नेत्रों में बहुत अधिक आँसू उमड़ आये

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॥ २ · १०३ · १७ ॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे भृशमाश्वास्य दुःखितम्। अब्रुवञ्जगतीभर्तुः क्रियतामुदकं पितुः

tataste bhrātaraḥ sarve bhṛśamāśvāsya duḥkhitam।
abruvañjagatībhartuḥ kriyatāmudakaṁ pituḥ ॥

तदनन्तर सभी भाइयों ने दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी को सान्त्वना देते हुए कहा—‘भैया! अब पृथ्वीपति पिताजी के लिये जलाञ्जलि दान कीजिये’

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॥ २ · १०३ · १८ ॥
सा सीता स्वर्गतं श्रुत्वा श्वशुरं तं महानृपम्। नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां शशाकेक्षितुं प्रियम्

sā sītā svargataṁ śrutvā śvaśuraṁ taṁ mahānṛpam।
netrābhyāmaśrupūrṇābhyāṁ na śaśākekṣituṁ priyam ॥

अपने श्वशुर महाराज दशरथ के स्वर्गवास का समाचार सुनकर सीता के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख न सकीं

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॥ २ · १०३ · १९ ॥
सान्त्वयित्वा तु तां रामो रुदतीं जनकात्मजाम्। उवाच लक्ष्मणं तत्र दुःखितो दुःखितं वचः

sāntvayitvā tu tāṁ rāmo rudatīṁ janakātmajām।
uvāca lakṣmaṇaṁ tatra duḥkhito duḥkhitaṁ vacaḥ ॥

तदनन्तर रोती हुई जनककुमारी को सान्त्वना देकर दुःखमग्न श्रीराम ने अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण से कहा—

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॥ २ · १०३ · २० ॥
आनयेङ्गुदिपिण्याकं चीरमाहर चोत्तरम्। जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः

ānayeṅgudipiṇyākaṁ cīramāhara cottaram।
jalakriyārthaṁ tātasya gamiṣyāmi mahātmanaḥ ॥

‘भाई! तुम इङ्गुदी का पिसा हुआ फल और चीर एवं उत्तरीय ले आओ। मैं महात्मा पिता को जलदान देने के लिये चलूँगा

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॥ २ · १०३ · २१ ॥
सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज। अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा

sītā purastād vrajatu tvamenāmabhito vraja।
ahaṁ paścād gamiṣyāmi gatirhyeṣā sudāruṇā ॥

‘सीता आगे-आगे चलें। इनके पीछे तुम चलो और तुम्हारे पीछे मैं चलूँगा। शोक के समय की यही परिपाटी है, जो अत्यन्त दारुण होती है’

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॥ २ · १०३ · २२ ॥
ततो नित्यानुगस्तेषां विदितात्मा महामतिः। मृदुर्दान्तश्च कान्तश्च रामे दृढभक्तिमान्

tato nityānugasteṣāṁ viditātmā mahāmatiḥ।
mṛdurdāntaśca kāntaśca rāme ca dṛḍhabhaktimān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · २३ ॥
सुमन्त्रस्तैर्नृपसुतैः सार्धमाश्वास्य राघवम्। अवतारयदालम्ब्य नदीं मन्दाकिनीं शिवाम्

sumantrastairnṛpasutaiḥ sārdhamāśvāsya rāghavam।
avatārayadālambya nadīṁ mandākinīṁ śivām ॥

॥ २२–२३ ॥

तत्पश्चात् उनके कुल के परम्परागत सेवक, आत्मज्ञानी, परम बुद्धिमान्, कोमल स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, तेजस्वी और श्रीराम के सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारों के साथ श्रीराम को धैर्य बँधाकर उन्हें हाथ का सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनी के तट पर ले गये

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॥ २ · १०३ · २४ ॥
ते सुतीर्थां ततः कृच्छ्रादुपगम्य यशस्विनः। नदीं मन्दाकिनीं रम्यां सदा पुष्पितकाननाम्

te sutīrthāṁ tataḥ kṛcchrādupagamya yaśasvinaḥ।
nadīṁ mandākinīṁ ramyāṁ sadā puṣpitakānanām ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · २५ ॥
शीघ्रस्रोतसमासाद्य तीर्थं शिवमकर्दमम्। सिषिचुस्तूदकं राज्ञे तत एतद् भवत्विति

śīghrasrotasamāsādya tīrthaṁ śivamakardamam।
siṣicustūdakaṁ rājñe tata etad bhavatviti ॥

॥ २४–२५ ॥

वे यशस्वी राजकुमार सदा पुष्पित कानन से सुशोभित, शीघ्र गति से प्रवाहित होनेवाली और उत्तम घाटवाली रमणीय नदी मन्दाकिनी के तट पर कठिनाई से पहुँचे तथा उसके पङ्करहित, कल्याणप्रद, तीर्थभूत जल को लेकर उन्होंने राजा के लिये जल दिया। उस समय वे बोले—‘पिताजी! यह जल आपकी सेवा में उपस्थित हो’॥

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॥ २ · १०३ · २६ ॥
प्रगृह्य तु महीपालो जलापूरितमञ्जलिम्। दिशं याम्यामभिमुखो रुदन् वचनमब्रवीत्

pragṛhya tu mahīpālo jalāpūritamañjalim।
diśaṁ yāmyāmabhimukho rudan vacanamabravīt ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · २७ ॥
एतत् ते राजशार्दूल विमलं तोयमक्षयम्। पितृलोकगतस्याद्य मद्दत्तमुपतिष्ठतु

etat te rājaśārdūla vimalaṁ toyamakṣayam।
pitṛlokagatasyādya maddattamupatiṣṭhatu ॥

॥ २६–२७ ॥

पृथ्वीपालक श्रीराम ने जल से भरी हुई अञ्जलि ले दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रोते हुए इस प्रकार कहा—‘मेरे पूज्य पिता राजशिरोमणि महाराज दशरथ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोक में गये हुए आपको अक्षयरूप से प्राप्त हो’

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॥ २ · १०३ · २८ ॥
ततो मन्दाकिनीतीरं प्रत्युत्तीर्य राघवः। पितुश्चकार तेजस्वी निर्वापं भ्रातृभिः सह

tato mandākinītīraṁ pratyuttīrya sa rāghavaḥ।
pituścakāra tejasvī nirvāpaṁ bhrātṛbhiḥ saha ॥

इसके बाद मन्दाकिनी के जल से निकलकर किनारे पर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजी ने अपने भाइयों के साथ मिलकर पिता के लिये पिण्डदान किया

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॥ २ · १०३ · २९ ॥
ऐङ्गुदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे। न्यस्य रामः सुदुःखार्तो रुदन् वचनमब्रवीत्

aiṅgudaṁ badarairmiśraṁ piṇyākaṁ darbhasaṁstare।
nyasya rāmaḥ suduḥkhārto rudan vacanamabravīt ॥

उन्होंने इङ्गुदी के गूदे में बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशों पर उसे रखकर अत्यन्त दुःख से आर्त हो रोते हुए यह बात कही—

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॥ २ · १०३ · ३० ॥
इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम्। यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः

idaṁ bhuṅkṣva mahārāja prīto yadaśanā vayam।
yadannaḥ puruṣo bhavati tadannāstasya devatāḥ ॥

‘महाराज! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिये; क्योंकि आजकल यही हमलोगों का आहार है। मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं’

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॥ २ · १०३ · ३१ ॥
ततस्तेनैव मार्गेण प्रत्युत्तीर्य सरित्तटात्। आरुरोह नरव्याघ्रो रम्यसानुं महीधरम्

tatastenaiva mārgeṇa pratyuttīrya sarittaṭāt।
āruroha naravyāghro ramyasānuṁ mahīdharam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · ३२ ॥
ततः पर्णकुटीद्वारमासाद्य जगतीपतिः। परिजग्राह पाणिभ्यामुभौ भरतलक्ष्मणौ

tataḥ parṇakuṭīdvāramāsādya jagatīpatiḥ।
parijagrāha pāṇibhyāmubhau bharatalakṣmaṇau ॥

॥ ३१–३२ ॥

इसके बाद उसी मार्ग से मन्दाकिनीतट के ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखरवाले चित्रकूट पर्वत पर चढ़े और पर्णकुटी के द्वार पर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयों को दोनों हाथों से पकड़कर रोने लगे

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॥ २ · १०३ · ३३ ॥
तेषां तु रुदतां शब्दात् प्रतिशब्दोऽभवद् गिरौ। भ्रातृणां सह वैदेह्या सिंहानां नर्दतामिव

teṣāṁ tu rudatāṁ śabdāt pratiśabdo'bhavad girau।
bhrātṛṇāṁ saha vaidehyā siṁhānāṁ nardatāmiva ॥

सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयों के रुदन-शब्द से उस पर्वत पर गरजते हुए सिंहों के दहाड़ने के समान प्रतिध्वनि होने लगी

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॥ २ · १०३ · ३४ ॥
महाबलानां रुदतां कुर्वतामुदकं पितुः। विज्ञाय तुमुलं शब्दं त्रस्ता भरतसैनिकाः

mahābalānāṁ rudatāṁ kurvatāmudakaṁ pituḥ।
vijñāya tumulaṁ śabdaṁ trastā bharatasainikāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०३ · ३५ ॥
अब्रुवंश्चापि रामेण भरतः संगतो ध्रुवम्। तेषामेव महान् शब्दः शोचतां पितरं मृतम्

abruvaṁścāpi rāmeṇa bharataḥ saṁgato dhruvam।
teṣāmeva mahān śabdaḥ śocatāṁ pitaraṁ mṛtam ॥

॥ ३४–३५ ॥

पिता को जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइयों के रोदन का तुमुल नाद सुनकर भरत के सैनिक किसी भय की आशङ्का से डर गये। फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरे से बोले—‘निश्चय ही भरत श्रीरामचन्द्रजी से मिले हैं। अपने परलोकवासी पिता के लिये शोक करनेवाले उन चारों भाइयों के रोने का ही यह महान् शब्द है’

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॥ २ · १०३ · ३६ ॥
अथ वाहान् परित्यज्य तं सर्वेऽभिमुखाः स्वनम्। अप्येकमनसो जग्मुर्यथास्थानं प्रधाविताः

atha vāhān parityajya taṁ sarve'bhimukhāḥ svanam।
apyekamanaso jagmuryathāsthānaṁ pradhāvitāḥ ॥

यों कहकर उन सबने अपनी सवारियों को तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थान से वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े

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॥ २ · १०३ · ३७ ॥
हयैरन्ये गजैरन्ये रथैरन्ये स्वलंकृतैः। सुकुमारास्तथैवान्ये पद्भिरेव नरा ययुः

hayairanye gajairanye rathairanye svalaṁkṛtaiḥ।
sukumārāstathaivānye padbhireva narā yayuḥ ॥

उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमें से कुछ लोग घोड़ों से, कुछ हाथियों से और कुछ सजे-सजाये रथों से ही आगे बढ़े। कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये

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॥ २ · १०३ · ३८ ॥
अचिरप्रोषितं रामं चिरविप्रोषितं यथा। द्रष्टुकामो जनः सर्वो जगाम सहसाश्रमम्

aciraproṣitaṁ rāmaṁ ciraviproṣitaṁ yathā।
draṣṭukāmo janaḥ sarvo jagāma sahasāśramam ॥

यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी को परदेश में आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगों को ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकाल से परदेश में रह रहे हैं; अतः सब लोग उनके दर्शन की इच्छा से सहसा आश्रम की ओर चल दिये

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॥ २ · १०३ · ३९ ॥
भ्रातृणां त्वरितास्ते तु द्रष्टुकामाः समागमम्। ययुर्बहुविधैर्यानैः खुरनेमिसमाकुलैः

bhrātṛṇāṁ tvaritāste tu draṣṭukāmāḥ samāgamam।
yayurbahuvidhairyānaiḥ khuranemisamākulaiḥ ॥

वे लोग चारों भाइयों का मिलन देखने की इच्छा से खुरों एवं पहियों से युक्त नाना प्रकार की सवारियोंद्वारा बड़ी उतावली के साथ चले

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॥ २ · १०३ · ४० ॥
सा भूमिर्बहुभिर्यानै रथनेमिसमाहता। मुमोच तुमुलं शब्दं द्यौरिवाभ्रसमागमे

sā bhūmirbahubhiryānai rathanemisamāhatā।
mumoca tumulaṁ śabdaṁ dyaurivābhrasamāgame ॥

अनेक प्रकार की सवारियों तथा रथ की पहियों से आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी; ठीक उसी तरह जैसे मेघों की घटा घिर आने पर आकाश में गड़गड़ाहट होने लगती है

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॥ २ · १०३ · ४१ ॥
तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः। आवासयन्तो गन्धेन जग्मुरन्यद्वनं ततः

tena vitrāsitā nāgāḥ kareṇuparivāritāḥ।
āvāsayanto gandhena jagmuranyadvanaṁ tataḥ ॥

उस तुमुल नाद से भयभीत हुए हाथी हथिनियों से घिरकर मद की गन्ध से उस स्थान को सुवासित करते हुए वहाँ से दूसरे वन में भाग गये

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॥ २ · १०३ · ४२ ॥
वराहवृकसिंहाश्च महिषाः सृमरास्तथा। व्याघ्रगोकर्णगवया वित्रेसुः पृषतैः सह

varāhavṛkasiṁhāśca mahiṣāḥ sṛmarāstathā।
vyāghragokarṇagavayā vitresuḥ pṛṣataiḥ saha ॥

वराह, भेड़िये, सिंह, भैंसे, सृमर (मृगविशेष), व्याघ्र, गोकर्ण (मृगविशेष) और गवय (नीलगाय), चितकबरे हरिणोंसहित संत्रस्त हो उठे

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॥ २ · १०३ · ४३ ॥
रथाह्वहंसानत्यूहाः प्लवाः कारण्डवाः परे। तथा पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः

rathāhvahaṁsānatyūhāḥ plavāḥ kāraṇḍavāḥ pare।
tathā puṁskokilāḥ krauñcā visaṁjñā bhejire diśaḥ ॥

चक्रवाक, हंस, जलकुक्कुर, वक, कारण्डव, नरकोकिल और क्रौञ्च पक्षी होश-हवास खोकर विभिन्न दिशाओं में उड़ गये

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॥ २ · १०३ · ४४ ॥
तेन शब्देन वित्रस्तैराकाशं पक्षिभिर्वृतम्। मनुष्यैरावृता भूमिरुभयं प्रबभौ तदा

tena śabdena vitrastairākāśaṁ pakṣibhirvṛtam।
manuṣyairāvṛtā bhūmirubhayaṁ prababhau tadā ॥

उस शब्द से डरे हुए पक्षी आकाश में छा गये और नीचे की भूमि मनुष्यों से भर गयी। इस प्रकार उन दोनों की समानरूप से शोभा होने लगी

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॥ २ · १०३ · ४५ ॥
ततस्तं पुरुषव्याघ्रं यशस्विनमकल्मषम्। आसीनं स्थण्डिले रामं ददर्श सहसा जनः

tatastaṁ puruṣavyāghraṁ yaśasvinamakalmaṣam।
āsīnaṁ sthaṇḍile rāmaṁ dadarśa sahasā janaḥ ॥

लोगों ने सहसा पहुँचकर देखा—यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदी पर बैठे हैं

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॥ २ · १०३ · ४६ ॥
विगर्हमाणः कैकेयीं मन्थरासहितामपि। अभिगम्य जनो रामं बाष्पपूर्णमुखोऽभवत्

vigarhamāṇaḥ kaikeyīṁ mantharāsahitāmapi।
abhigamya jano rāmaṁ bāṣpapūrṇamukho'bhavat ॥

श्रीराम के पास जाने पर सबके मुख आँसुओं से भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयी की निन्दा करने लगे

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॥ २ · १०३ · ४७ ॥
तान् नरान् बाष्पपूर्णाक्षान् समीक्ष्याथ सुदुःखितान्। पर्यष्वजत धर्मज्ञः पितृवन्मातृवच्च सः

tān narān bāṣpapūrṇākṣān samīkṣyātha suduḥkhitān।
paryaṣvajata dharmajñaḥ pitṛvanmātṛvacca saḥ ॥

उन सब लोगों के नेत्र आँसुओं से भरे हुए थे और वे सब-के-सब अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। धर्मज्ञ श्रीराम ने उन्हें देखकर पिता-माता की भाँति हृदय से लगाया

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॥ २ · १०३ · ४८ ॥
तत्र कांश्चित् परिषस्वजे नरान् नराश्च केचित्तु तमभ्यवादयन्। चकार सर्वान् सवयस्यबान्धवान् यथार्हमासाद्य तदा नृपात्मजः

sa tatra kāṁścit pariṣasvaje narān narāśca kecittu tamabhyavādayan।
cakāra sarvān savayasyabāndhavān yathārhamāsādya tadā nṛpātmajaḥ ॥

श्रीराम ने कुछ मनुष्यों को वहाँ छाती से लगाया तथा कुछ लोगों ने पहुँचकर वहाँ उनके चरणों में प्रणाम किया। राजकुमार श्रीराम ने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवों का यथायोग्य सम्मान किया

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॥ २ · १०३ · ४९ ॥
ततः तेषां रुदतां महात्मनां भुवं खं चानुविनादयन् स्वनः। गुहा गिरीणां दिशश्च संततं मृदङ्गघोषप्रतिमो विशुश्रुवे

tataḥ sa teṣāṁ rudatāṁ mahātmanāṁ bhuvaṁ ca khaṁ cānuvinādayan svanaḥ।
guhā girīṇāṁ ca diśaśca saṁtataṁ mṛdaṅgaghoṣapratimo viśuśruve ॥

उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओं का वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतों की गुफा और सम्पूर्ण दिशाओं को निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्ग की ध्वनि के समान सुनायी पड़ता था

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्र्यधिकशततमः सर्गः ॥ १०३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०३ ॥