वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०२ · ९ श्लोकाःSarga 102 · 9 ślokas

भरतका पुनः श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेका अनुरोध करके उनसे पिताकी मृत्युका समाचार बताना

राज्य-अनुरोध

“राज्य-अनुरोध”
॥ २ · १०२ · १–३ ॥

चित्रकूटपर्णशालाप्राङ्गणे शोकार्तो भरतः, अरक्तश्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणः, ज्येष्ठभ्रातुरग्रे जानुभ्यां निपत्य कृताञ्जलिरश्रुसिक्तेनोन्नतमुखेन अयोध्यां प्रत्यागत्य राज्याभिषेकं स्वीकर्तुं याचते; श्यामवर्णो रामस्तु कुशासने पर्णशालाद्वारि शान्ततपस्विरूपेणोपविष्ट एकं करं मृदूत्थाप्य स्थिरनिश्चयेन प्रत्याख्याति, तस्य करुणापूर्णे नयने पितृवचसि अखण्डधर्मनिष्ठया दृढे; भरतसमीपे शत्रुघ्नोऽपि श्वेतशोकवस्त्रे नतशिराः सहशोको, रामस्य पृष्ठे वल्कलधारी लक्ष्मणः प्रतीक्षते, पर्णशालाद्वारि च सीता सरलवनसाटिकायामुचितान्तरे उपविष्टा; मृदुस्वर्णालोके करुणभक्तेः शान्तसंकल्पस्य च दृश्यम्।

चित्रकूट की पर्णकुटी के आँगन में शोकजर्जर भरत, बिना रंगे श्वेत शोकवस्त्र में आभूषणहीन, अपने अग्रज के सम्मुख घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड़े अंजलिबद्ध, अश्रुसिक्त उठे हुए मुख से अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक स्वीकार करने की करुण विनती करते हैं; श्यामवर्ण श्रीराम कुश की चटाई पर कुटी-द्वार पर शान्त तपस्वी-वेश में विराजमान, एक हाथ मृदुता से उठाकर स्थिर, अटल भाव से इनकार करते हैं, उनके करुणामय नेत्र पितृवचन के प्रति अखण्ड धर्मनिष्ठा से दृढ़ हैं; भरत के पास शत्रुघ्न भी श्वेत शोकवस्त्र में सिर झुकाये सहभागी शोक में खड़े हैं, श्रीराम के पीछे वल्कलधारी लक्ष्मण प्रतीक्षारत हैं, और कुटी के द्वार पर सीता सादी वन-साड़ी में समुचित दूरी पर बैठी हैं; कोमल स्वर्णिम आलोक में करुण भक्ति और शान्त संकल्प का दृश्य।

In the leaf-hut clearing on Chitrakut, the grief-worn prince Bharat — wrapped in plain undyed white mourner's cloth, his ornaments laid aside — kneels before his elder brother with hands folded in reverent añjali and his tear-marked face upturned, imploring Ram to return to Ayodhya and accept the throne; the blue-hued Ram, a serene forest ascetic seated on a mat of kuśa grass at the door of his parṇaśālā, gently raises one hand in a quiet, unshakable gesture of refusal, his compassionate eyes firm with duty to their dead father's word, while beside Bharat his brother Shatrughna stands in mourning white with bowed head in shared grief, Lakshman waits in bark-cloth behind Ram, and Sita sits at a respectful distance in a simple forest sari at the hut entrance, all bathed in a tender golden light of sorrowful devotion and calm resolve.

॥ २ · १०२ · १ ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा भरतः प्रत्युवाच ह। किं मे धर्माद् विहीनस्य राजधर्मः करिष्यति

rāmasya vacanaṁ śrutvā bharataḥ pratyuvāca ha।
kiṁ me dharmād vihīnasya rājadharmaḥ kariṣyati ॥

श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर भरत ने इस प्रकार उत्तर दिया—‘भैया! मैं राज्य का अधिकारी न होने के कारण उस राजधर्म के अधिकार से रहित हूँ, अतः मेरे लिये यह राजधर्म का उपदेश किस काम आयगा?

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॥ २ · १०२ · २ ॥
शाश्वतोऽयं सदा धर्मः स्थितोऽस्मासु नरर्षभ। ज्येष्ठे पुत्रे स्थिते राजा कनीयान् भवेन्नृपः

śāśvato'yaṁ sadā dharmaḥ sthito'smāsu nararṣabha।
jyeṣṭhe putre sthite rājā na kanīyān bhavennṛpaḥ ॥

‘नरश्रेष्ठ! हमारे यहाँ सदा से ही इस शाश्वत धर्म का पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता

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॥ २ · १०२ · ३ ॥
समृद्धां मया सार्धमयोध्यां गच्छ राघव। अभिषेचय चात्मानं कुलस्यास्य भवाय नः

sa samṛddhāṁ mayā sārdhamayodhyāṁ gaccha rāghava।
abhiṣecaya cātmānaṁ kulasyāsya bhavāya naḥ ॥

‘अतः रघुनन्दन! आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरी को चलिये और हमारे कुल के अभ्युदय के लिये राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये

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॥ २ · १०२ · ४ ॥
राजानं मानुषं प्राहुर्देवत्वे सम्मतो मम। यस्य धर्मार्थसहितं वृत्तमाहुरमानुषम्

rājānaṁ mānuṣaṁ prāhurdevatve sammato mama।
yasya dharmārthasahitaṁ vṛttamāhuramānuṣam ॥

‘यद्यपि सब लोग राजा को मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी राय में वह देवत्व पर प्रतिष्ठित है; क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचार को साधारण मनुष्य के लिये असम्भावित बताया गया है

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॥ २ · १०२ · ५ ॥
केकयस्थे मयि तु त्वयि चारण्यमाश्रिते। धीमान् स्वर्गं गतो राजा यायजूकः सतां मतः

kekayasthe ca mayi tu tvayi cāraṇyamāśrite।
dhīmān svargaṁ gato rājā yāyajūkaḥ satāṁ mataḥ ॥

‘जब मैं केकयदेश में था और आप वन में चले आये थे, तब अश्वमेध आदि यज्ञों के कर्ता और सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् महाराज दशरथ स्वर्गलोक को चले गये

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॥ २ · १०२ · ६ ॥
निष्क्रान्तमात्रे भवति सहसीते सलक्ष्मणे। दुःखशोकाभिभूतस्तु राजा त्रिदिवमभ्यगात्

niṣkrāntamātre bhavati sahasīte salakṣmaṇe।
duḥkhaśokābhibhūtastu rājā tridivamabhyagāt ॥

‘सीता और लक्ष्मण के साथ आपके राज्य से निकलते ही दुःख-शोक से पीड़ित हुए महाराज स्वर्गलोक को चल दिये

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॥ २ · १०२ · ७ ॥
उत्तिष्ठ पुरुषव्याघ्र क्रियतामुदकं पितुः। अहं चायं शत्रुघ्नः पूर्वमेव कृतोदकौ

uttiṣṭha puruṣavyāghra kriyatāmudakaṁ pituḥ।
ahaṁ cāyaṁ ca śatrughnaḥ pūrvameva kṛtodakau ॥

‘पुरुषसिंह! उठिये और पिता को जलाञ्जलि दान कीजिये। मैं और यह शत्रुघ्न—दोनों पहले ही उनके लिये जलाञ्जलि दे चुके हैं

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॥ २ · १०२ · ८ ॥
प्रियेण किल दत्तं हि पितृलोकेषु राघव। अक्षयं भवतीत्याहुर्भवांश्चैव पितुः प्रियः

priyeṇa kila dattaṁ hi pitṛlokeṣu rāghava।
akṣayaṁ bhavatītyāhurbhavāṁścaiva pituḥ priyaḥ ॥

‘रघुनन्दन! कहते हैं, प्रिय पुत्र का दिया हुआ जल आदि पितृलोक में अक्षय होता है और आप पिता के परम प्रिय पुत्र हैं

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॥ २ · १०२ · ९ ॥
त्वामेव शोचंस्तव दर्शनेप्सुस्त्वय्येव सक्तामनिवर्त्य बुद्धिम्। त्वया विहीनस्तव शोकरुग्णस्त्वां संस्मरन्नेव गतः पिता ते

tvāmeva śocaṁstava darśanepsustvayyeva saktāmanivartya buddhim।
tvayā vihīnastava śokarugṇastvāṁ saṁsmaranneva gataḥ pitā te ॥

‘आपके पिता आपसे विलग होते ही शोक के कारण रुग्ण हो गये और आपके ही शोक में मग्न हो, आपको ही देखने की इच्छा रखकर, आपमें ही लगी हुई बुद्धि को आपकी ओर से न हटाकर, आपका ही स्मरण करते हुए स्वर्ग को चले गये’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्व्यधिकशततमः सर्गः ॥ १०२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०२ ॥