वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १०१ · २७ श्लोकाःSarga 101 · 27 ślokas

श्रीरामका भरतसे वनमें आगमनका प्रयोजन पूछना, भरतका उनसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना और श्रीरामका उसे अस्वीकार कर देना

पितृनिधन-निवेदन

“पितृनिधन-निवेदन”
॥ २ · १०१ · ४–५ ॥

चित्रकूटपर्णशालाया अग्रे जटाजूटधरो वल्कलनिवसनो नग्नवक्षाः श्यामवर्णस्तपस्वी रामः, किमर्थं त्वं चीरजटाधारी वनमागत इति भ्रातरम् अधुनैव पृष्टवान्; तस्य पुरतः श्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणः शोकार्तो भरतः प्राञ्जलिरवनतवदनो निगृहीताश्रुनयनः, 'तातो दशरथः स्वर्गं गतः' इति घोरं वचनं कृच्छ्रेण उदीरयति; रामस्य मुखं प्रथमशोकाघातेन विदीर्णं विवृतौष्ठम् अर्धोत्थितकरं च; समीपे वल्कलधरो ब्रह्मवर्णो लक्ष्मणः स्तब्धो मौनश्च तस्मिन् शोके सहभागी तिष्ठति; पृष्ठतः पर्णकुटी वनाच्छादितश्चित्रकूटसानुश्च मृदुशोकमय्यां प्रभायां निमग्नौ।

चित्रकूट की पर्णकुटी के आगे, श्याम वर्ण के तपस्वी श्रीराम — ऊँचा जटाजूट बाँधे, कमर से घुटनों तक वल्कल लपेटे और वक्षःस्थल अनावृत — अपने भाई से अभी-अभी पूछ बैठे हैं कि वह वल्कल और जटा धारण किये इस वन में क्यों आया है; उनके सम्मुख शोकजर्जर भरत, बिना रंगा श्वेत शोकवस्त्र पहने और सारे आभूषण उतारे हुए, हाथ जोड़े, मुख झुकाये और रोके हुए आँसुओं से भीगे नेत्रों से बड़े कष्ट से यह कठोर समाचार सुनाते हैं कि पिता दशरथ स्वर्गसिधार गये; श्रीराम का मुख शोक की प्रथम चोट से विदीर्ण है — ओंठ खुले हुए, एक हाथ उस आघात को सहते-सहते आधा उठा हुआ; पास ही वल्कलधारी गौरवर्ण तपस्वी लक्ष्मण स्तब्ध और मौन खड़े इस पीड़ा में सहभागी हैं; पीछे पर्णशाला और चित्रकूट का वनाच्छादित ढाल कोमल शोकमयी आभा में डूबे हैं।

Before the leaf-hut on Chitrakut, the blue-hued ascetic Ram — his matted topknot bound high, bark-cloth wrapped from waist to knee, his torso bare — has only just asked his brother why he too has come to the forest in bark and matted hair; facing him the grief-worn Bharat, robed in plain undyed white mourner's cloth and stripped of every ornament, his palms pressed together, his face lowered and his eyes wet with restrained tears, forces out with great difficulty the terrible words that their father Dasharath has passed to heaven; Ram's face breaks in the very first instant of grief — lips parting, one hand half-rising as the blow lands — while close beside them the warm-brown, bark-clad ascetic Lakshman stands stricken and silent, sharing the sorrow, the leaf-hut and the wooded Chitrakut slope behind them steeped in soft, sorrowful light.

॥ २ · १०१ · १ ॥
तं तु रामः समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम्। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे

taṁ tu rāmaḥ samājñāya bhrātaraṁ guruvatsalam।
lakṣmaṇena saha bhrātrā praṣṭuṁ samupacakrame ॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी ने अपने गुरुभक्त भाई भरत को अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—

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॥ २ · १०१ · २ ॥
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया। यस्मात् त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी

kimetadiccheyamahaṁ śrotuṁ pravyāhṛtaṁ tvayā।
yasmāt tvamāgato deśamimaṁ cīrajaṭājinī ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १०१ · ३ ॥
यन्निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधरः। हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि

yannimittamimaṁ deśaṁ kṛṣṇājinajaṭādharaḥ।
hitvā rājyaṁ praviṣṭastvaṁ tat sarvaṁ vaktumarhasi ॥

॥ २–३ ॥

‘भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देश में आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्त से इस वन में तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये’

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॥ २ · १०१ · ४ ॥
इत्युक्तः केकयीपुत्रः काकुत्स्थेन महात्मना। प्रगृह्य बलवद् भूयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्

ityuktaḥ kekayīputraḥ kākutsthena mahātmanā।
pragṛhya balavad bhūyaḥ prāñjalirvākyamabravīt ॥

ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर भरत ने बलपूर्वक आन्तरिक शोक को दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—

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॥ २ · १०१ · ५ ॥
आर्य तातः परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम्। गतः स्वर्गं महाबाहुः पुत्रशोकाभिपीडितः

ārya tātaḥ parityajya kṛtvā karma suduṣkaram।
gataḥ svargaṁ mahābāhuḥ putraśokābhipīḍitaḥ ॥

‘आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोक से पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये

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॥ २ · १०१ · ६ ॥
स्त्रिया नियुक्तः कैकेय्या मम मात्रा परंतप। चकार सा महत्पापमिदमात्मयशोहरम्

striyā niyuktaḥ kaikeyyā mama mātrā paraṁtapa।
cakāra sā mahatpāpamidamātmayaśoharam ॥

‘शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनन्दन! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयी की प्रेरणा से ही विवश हो पिताजी ने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँ ने अपने सुयश को नष्ट करनेवाला यह बड़ा भारी पाप किया है

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॥ २ · १०१ · ७ ॥
सा राज्यफलमप्राप्य विधवा शोककर्शिता। पतिष्यति महाघोरे नरके जननी मम

sā rājyaphalamaprāpya vidhavā śokakarśitā।
patiṣyati mahāghore narake jananī mama ॥

‘अतः वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोक से दुर्बल हो महाघोर नरक में पड़ेगी

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॥ २ · १०१ · ८ ॥
तस्य मे दासभूतस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि। अभिषिञ्चस्व चाद्यैव राज्येन मघवानिव

tasya me dāsabhūtasya prasādaṁ kartumarhasi।
abhiṣiñcasva cādyaiva rājyena maghavāniva ॥

‘अब आप अपने दासस्वरूप मुझ भरत पर कृपा कीजिये और इन्द्र की भाँति आज ही राज्य ग्रहण करने के लिये अपना अभिषेक कराइये

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॥ २ · १०१ · ९ ॥
इमाः प्रकृतयः सर्वा विधवा मातरश्च याः। त्वत्सकाशमनुप्राप्ताः प्रसादं कर्तुमर्हसि

imāḥ prakṛtayaḥ sarvā vidhavā mātaraśca yāḥ।
tvatsakāśamanuprāptāḥ prasādaṁ kartumarhasi ॥

‘ये सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं। आप इन सबपर कृपा करें

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॥ २ · १०१ · १० ॥
तथानुपूर्व्या युक्तश्च युक्तं चात्मनि मानद। राज्यं प्राप्नुहि धर्मेण सकामान् सुहृदः कुरु

tathānupūrvyā yuktaśca yuktaṁ cātmani mānada।
rājyaṁ prāpnuhi dharmeṇa sakāmān suhṛdaḥ kuru ॥

‘दूसरों को मान देनेवाले रघुवीर! आप ज्येष्ठ होने के नाते राज्य-प्राप्ति के क्रमिक अधिकार से युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है; अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदों को सफल-मनोरथ बनावें

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॥ २ · १०१ · ११ ॥
भवत्वविधवा भूमिः समग्रा पतिना त्वया। शशिना विमलेनेव शारदी रजनी यथा

bhavatvavidhavā bhūmiḥ samagrā patinā tvayā।
śaśinā vimaleneva śāradī rajanī yathā ॥

‘आप-जैसे पति से युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमा से सनाथ हुई शरत्काल की रात्रि के समान शोभा पाने लगे

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॥ २ · १०१ · १२ ॥
एभिश्च सचिवैः सार्धं शिरसा याचितो मया। भ्रातुः शिष्यस्य दासस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि

ebhiśca sacivaiḥ sārdhaṁ śirasā yācito mayā।
bhrātuḥ śiṣyasya dāsasya prasādaṁ kartumarhasi ॥

‘मैं इन समस्त सचिवों के साथ आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ। आप मुझपर कृपा करें

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॥ २ · १०१ · १३ ॥
तदिदं शाश्वतं पित्र्यं सर्वं सचिवमण्डलम्। पूजितं पुरुषव्याघ्र नातिक्रमितुमर्हसि

tadidaṁ śāśvataṁ pitryaṁ sarvaṁ sacivamaṇḍalam।
pūjitaṁ puruṣavyāghra nātikramitumarhasi ॥

‘पुरुषसिंह! यह सारा मन्त्रिमण्डल अपने यहाँ कुलपरम्परा से चला आ रहा है। ये सभी सचिव पिताजी के समय में भी थे। हम सदा से इनका सम्मान करते आये हैं, अतः आप इनकी प्रार्थना न ठुकरायें’

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॥ २ · १०१ · १४ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुः सबाष्पः कैकयीसुतः। रामस्य शिरसा पादौ जग्राह भरतः पुनः

evamuktvā mahābāhuḥ sabāṣpaḥ kaikayīsutaḥ।
rāmasya śirasā pādau jagrāha bharataḥ punaḥ ॥

ऐसा कहकर कैकेयीपुत्र महाबाहु भरत ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए पुनः श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से माथा टेक दिया

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॥ २ · १०१ · १५ ॥
तं मत्तमिव मातङ्गं निःश्वसन्तं पुनः पुनः। भ्रातरं भरतं रामः परिष्वज्येदमब्रवीत्

taṁ mattamiva mātaṅgaṁ niḥśvasantaṁ punaḥ punaḥ।
bhrātaraṁ bharataṁ rāmaḥ pariṣvajyedamabravīt ॥

उस समय वे मतवाले हाथी के समान बारंबार लंबी साँस खींचने लगे, तब श्रीराम ने भाई भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा—

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॥ २ · १०१ · १६ ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः। राज्यहेतोः कथं पापमाचरेन्मद्विधो जनः

kulīnaḥ sattvasampannastejasvī caritavrataḥ।
rājyahetoḥ kathaṁ pāpamācarenmadvidho janaḥ ॥

‘भाई! तुम्हीं बताओ। उत्तम कुल में उत्पन्न, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतों का पालन करनेवाला मेरे-जैसा मनुष्य राज्य के लिये पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन रूप पाप कैसे कर सकता है?

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॥ २ · १०१ · १७ ॥
दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन। चापि जननीं बाल्यात् त्वं विगर्हितुमर्हसि

na doṣaṁ tvayi paśyāmi sūkṣmamapyarisūdana।
na cāpi jananīṁ bālyāt tvaṁ vigarhitumarhasi ॥

‘शत्रुसूदन! मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता। अज्ञानवश तुम्हें अपनी माता की भी निन्दा नहीं करनी चाहिये

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॥ २ · १०१ · १८ ॥
कामकारो महाप्राज्ञ गुरूणां सर्वदानघ। उपपन्नेषु दारेषु पुत्रेषु विधीयते

kāmakāro mahāprājña gurūṇāṁ sarvadānagha।
upapanneṣu dāreṣu putreṣu ca vidhīyate ॥

‘निष्पाप महाप्राज्ञ! गुरुजनों का अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रों पर सदा पूर्ण अधिकार होता है। वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं

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॥ २ · १०१ · १९ ॥
वयमस्य यथा लोके संख्याताः सौम्य साधुभिः। भार्याः पुत्राश्च शिष्याश्च त्वमपि ज्ञातुमर्हसि

vayamasya yathā loke saṁkhyātāḥ saumya sādhubhiḥ।
bhāryāḥ putrāśca śiṣyāśca tvamapi jñātumarhasi ॥

‘सौम्य! माताओंसहित हम भी इस लोक में श्रेष्ठ पुरुषों-द्वारा महाराज के स्त्री-पुत्र और शिष्य कहे गये हैं, अतः हमें भी उनको सब तरह की आज्ञा देने का अधिकार था। इस बात को तुम भी समझने योग्य हो

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॥ २ · १०१ · २० ॥
वने वा चीरवसनं सौम्य कृष्णाजिनाम्बरम्। राज्ये वापि महाराजो मां वासयितुमीश्वरः

vane vā cīravasanaṁ saumya kṛṣṇājināmbaram।
rājye vāpi mahārājo māṁ vāsayitumīśvaraḥ ॥

‘सौम्य! महाराज मुझे वल्कल वस्त्र और मृगचर्म धारण कराकर वन में ठहरावें अथवा राज्य पर बिठावें—इन दोनों बातों के लिये वे सर्वथा समर्थ थे

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॥ २ · १०१ · २१ ॥
यावत् पितरि धर्मज्ञ गौरवं लोकसत्कृते। तावद् धर्मकृतां श्रेष्ठ जनन्यामपि गौरवम्

yāvat pitari dharmajña gauravaṁ lokasatkṛte।
tāvad dharmakṛtāṁ śreṣṭha jananyāmapi gauravam ॥

‘धर्मज्ञ! धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भरत! मनुष्य की विश्ववन्द्य पिता में जितनी गौरव-बुद्धि होती है, उतनी ही माता में भी होनी चाहिये

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॥ २ · १०१ · २२ ॥
एताभ्यां धर्मशीलाभ्यां वनं गच्छेति राघव। मातापितृभ्यामुक्तोऽहं कथमन्यत् समाचरे

etābhyāṁ dharmaśīlābhyāṁ vanaṁ gaccheti rāghava।
mātāpitṛbhyāmukto'haṁ kathamanyat samācare ॥

‘रघुनन्दन! इन धर्मशील माता और पिता दोनों ने जब मुझे वन में जाने की आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञा के विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ?

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॥ २ · १०१ · २३ ॥
त्वया राज्यमयोध्यायां प्राप्तव्यं लोकसत्कृतम्। वस्तव्यं दण्डकारण्ये मया वल्कलवाससा

tvayā rājyamayodhyāyāṁ prāptavyaṁ lokasatkṛtam।
vastavyaṁ daṇḍakāraṇye mayā valkalavāsasā ॥

‘तुम्हें अयोध्या में रहकर समस्त जगत् के लिये आदरणीय राज्य प्राप्त करना चाहिये और मुझे वल्कल वस्त्र धारण करके दण्डकारण्य में रहना चाहिये

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॥ २ · १०१ · २४ ॥
एवमुक्त्वा महाराजो विभागं लोकसंनिधौ। व्यादिश्य महाराजो दिवं दशरथो गतः

evamuktvā mahārājo vibhāgaṁ lokasaṁnidhau।
vyādiśya ca mahārājo divaṁ daśaratho gataḥ ॥

‘क्योंकि महाराज दशरथ बहुत लोगों के सामने हम दोनों के लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्ग को सिधारे हैं

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॥ २ · १०१ · २५ ॥
प्रमाणं धर्मात्मा राजा लोकगुरुस्तव। पित्रा दत्तं यथाभागमुपभोक्तुं त्वमर्हसि

sa ca pramāṇaṁ dharmātmā rājā lokagurustava।
pitrā dattaṁ yathābhāgamupabhoktuṁ tvamarhasi ॥

‘इस विषय में लोकगुरु धर्मात्मा राजा ही तुम्हारे लिये प्रमाणभूत हैं—उन्हींकी आज्ञा तुम्हें माननी चाहिये और पिता ने तुम्हारे हिस्से में जो कुछ दिया है, उसीका तुम्हें यथावत् रूप से उपभोग करना चाहिये

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॥ २ · १०१ · २६ ॥
चतुर्दश समाः सौम्य दण्डकारण्यमाश्रितः। उपभोक्ष्ये त्वहं दत्तं भागं पित्रा महात्मना

caturdaśa samāḥ saumya daṇḍakāraṇyamāśritaḥ।
upabhokṣye tvahaṁ dattaṁ bhāgaṁ pitrā mahātmanā ॥

‘सौम्य! चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्य में रहने के बाद ही महात्मा पिता के दिये हुए राज्य-भाग का मैं उपभोग करूँगा

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॥ २ · १०१ · २७ ॥
यदब्रवीन्मां नरलोकसत्कृतः पिता महात्मा विबुधाधिपोपमः। तदेव मन्ये परमात्मनो हितं सर्वलोकेश्वरभावमव्ययम्

yadabravīnmāṁ naralokasatkṛtaḥ pitā mahātmā vibudhādhipopamaḥ।
tadeva manye paramātmano hitaṁ na sarvalokeśvarabhāvamavyayam ॥

‘मनुष्यलोक में सम्मानित और देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिता ने मुझे जो वनवास की आज्ञा दी है, उसीको मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञा के विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्मा का अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाधिकशततमः सर्गः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०१ ॥