वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ५८ · ३७ श्लोकाःSarga 58 · 37 ślokas

सम्पातिका अपने पंख जलनेकी कथा सुनाना, सीता और रावणका पता बताना तथा वानरोंकी सहायतासे समुद्र-तटपर जाकर भाईको जलाञ्जलि देना

॥ ४ · ५८ · १ ॥
इत्युक्तः करुणं वाक्यं वानरैस्त्यक्तजीवितैः। सबाष्पो वानरान् गृध्रः प्रत्युवाच महास्वनः॥

ityuktaḥ karuṇaṁ vākyaṁ vānaraistyaktajīvitaiḥ।
sabāṣpo vānarān gṛdhraḥ pratyuvāca mahāsvanaḥ॥

जीवन की आशा त्यागकर बैठे हुए वानरों के मुख से यह करुणाजनक बात सुनकर सम्पाति के नेत्रों में आँसू आ गये। उन्होंने उच्च स्वर से उत्तर दिया—

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॥ ४ · ५८ · २ ॥
यवीयान् मम भ्राता जटायुर्नाम वानराः। यमाख्यात हतं युद्धे रावणेन बलीयसा॥

yavīyān sa mama bhrātā jaṭāyurnāma vānarāḥ।
yamākhyāta hataṁ yuddhe rāvaṇena balīyasā॥

‘वानरो! तुम जिसे महाबली रावण के द्वारा युद्ध में मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था

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॥ ४ · ५८ · ३ ॥
वृद्धभावादपक्षत्वाच्छृण्वंस्तदपि मर्षये। नहि मे शक्तिरस्त्यद्य भ्रातुर्वैरविमोक्षणे॥

vṛddhabhāvādapakṣatvācchṛṇvaṁstadapi marṣaye।
nahi me śaktirastyadya bhrāturvairavimokṣaṇe॥

‘मैं बूढ़ा हुआ। मेरे पंख जल गये। इसलिये अब मुझमें अपने भाई के वैर का बदला लेने की शक्ति नहीं रह गयी है। यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सहे लेता हूँ

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॥ ४ · ५८ · ४ ॥
पुरा वृत्रवधे वृत्ते चाहं जयैषिणौ। आदित्यमुपयातौ स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्॥

purā vṛtravadhe vṛtte sa cāhaṁ ca jayaiṣiṇau।
ādityamupayātau svo jvalantaṁ raśmimālinam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५८ · ५ ॥
आवृत्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गतौ भृशम्। मध्यं प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति॥

āvṛtyākāśamārgeṇa javena svargatau bhṛśam।
madhyaṁ prāpte tu sūrye tu jaṭāyuravasīdati॥

॥ ४–५ ॥

‘पहले की बात है जब इन्द्र के द्वारा वृत्रासुर का वध हो गया, तब इन्द्र को प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतने की इच्छा से पहले आकाशमार्ग के द्वारा बड़े वेग से स्वर्गलोक में गये। इन्द्र को जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्ग को प्रकाशित करनेवाले अंशुमाली सूर्य के पास आये। हममें से जटायु सूर्य के मध्याह्नकाल में उनके तेज से शिथिल होने लगा

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॥ ४ · ५८ · ६ ॥
तमहं भ्रातरं दृष्ट्वा सूर्यरश्मिभिरर्दितम्। पक्षाभ्यां छादयामास स्नेहात् परमविह्वलम्॥

tamahaṁ bhrātaraṁ dṛṣṭvā sūryaraśmibhirarditam।
pakṣābhyāṁ chādayāmāsa snehāt paramavihvalam॥

‘भाई को सूर्य की किरणों से पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखों से उसे ढक लिया

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॥ ४ · ५८ · ७ ॥
निर्दग्धपत्रः पतितो विन्ध्येऽहं वानरर्षभाः। अहमस्मिन् वसन् भ्रातुः प्रवृत्तिं नोपलक्षये॥

nirdagdhapatraḥ patito vindhye'haṁ vānararṣabhāḥ।
ahamasmin vasan bhrātuḥ pravṛttiṁ nopalakṣaye॥

‘वानरशिरोमणियो! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वत पर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाई का समाचार न पा सका (आज पहले-पहल तुमलोगों के मुख से उसके मारे जाने की बात मालूम हुई है)’

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॥ ४ · ५८ · ८ ॥
जटायुषस्त्वेवमुक्तो भ्रात्रा सम्पातिना तदा। युवराजो महाप्रज्ञः प्रत्युवाचाङ्गदस्तदा॥

jaṭāyuṣastvevamukto bhrātrā sampātinā tadā।
yuvarājo mahāprajñaḥ pratyuvācāṅgadastadā॥

जटायु के भाई सम्पाति के उस समय ऐसा कहने पर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गद ने उनसे इस प्रकार कहा—

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॥ ४ · ५८ · ९ ॥
जटायुषो यदि भ्राता श्रुतं ते गदितं मया। आख्याहि यदि जानासि निलयं तस्य रक्षसः॥

jaṭāyuṣo yadi bhrātā śrutaṁ te gaditaṁ mayā।
ākhyāhi yadi jānāsi nilayaṁ tasya rakṣasaḥ॥

‘गृध्रराज! यदि आप जटायु के भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षस का निवासस्थान जानते हैं तो हमें बताइये

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॥ ४ · ५८ · १० ॥
अदीर्घदर्शिनं तं वै रावणं राक्षसाधमम्। अन्तिके यदि वा दूरे यदि जानासि शंस नः॥

adīrghadarśinaṁ taṁ vai rāvaṇaṁ rākṣasādhamam।
antike yadi vā dūre yadi jānāsi śaṁsa naḥ॥

‘वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँ से निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें’

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॥ ४ · ५८ · ११ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा भ्राता ज्येष्ठो जटायुषः। आत्मानुरूपं वचनं वानरान् सम्प्रहर्षयन्॥

tato'bravīnmahātejā bhrātā jyeṣṭho jaṭāyuṣaḥ।
ātmānurūpaṁ vacanaṁ vānarān sampraharṣayan॥

तब जटायु के बड़े भाई महातेजस्वी सम्पाति ने वानरों का हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही—

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॥ ४ · ५८ · १२ ॥
निर्दग्धपक्षो गृध्रोऽहं गतवीर्यः प्लवङ्गमाः। वाङ्मात्रेण तु रामस्य करिष्ये साह्यमुत्तमम्॥

nirdagdhapakṣo gṛdhro'haṁ gatavīryaḥ plavaṅgamāḥ।
vāṅmātreṇa tu rāmasya kariṣye sāhyamuttamam॥

‘वानरो! मेरे पंख जल गये। अब मैं बेपर का गीध हूँ। मेरी शक्ति जाती रही (अतः मैं शरीर से तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि) वचनमात्र से भगवान् श्रीराम की उत्तम सहायता अवश्य करूँगा

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॥ ४ · ५८ · १३ ॥
जानामि वारुणाँल्लोकान् विष्णोस्त्रैविक्रमानपि। देवासुरविमर्दांश्च ह्यमृतस्य विमन्थनम्॥

jānāmi vāruṇām̐llokān viṣṇostraivikramānapi।
devāsuravimardāṁśca hyamṛtasya vimanthanam॥

‘मैं वरुण के लोकों को जानता हूँ। वामनावतार के समय भगवान् विष्णु ने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रखे थे, उन स्थानों का भी मुझे ज्ञान है। अमृत-मन्थन तथा देवासुरसंग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं

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॥ ४ · ५८ · १४ ॥
रामस्य यदिदं कार्यं कर्तव्यं प्रथमं मया। जरया हृतं तेजः प्राणाश्च शिथिला मम॥

rāmasya yadidaṁ kāryaṁ kartavyaṁ prathamaṁ mayā।
jarayā ca hṛtaṁ tejaḥ prāṇāśca śithilā mama॥

‘यद्यपि वृद्धावस्था ने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजी का यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है

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॥ ४ · ५८ · १५ ॥
तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता। ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन दुरात्मना॥

taruṇī rūpasampannā sarvābharaṇabhūṣitā।
hriyamāṇā mayā dṛṣṭā rāvaṇena durātmanā॥

‘एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रूपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था

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॥ ४ · ५८ · १६ ॥
क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति भामिनी। भूषणान्यपविध्यन्ती गात्राणि विधुन्वती॥

krośantī rāmarāmeti lakṣmaṇeti ca bhāminī।
bhūṣaṇānyapavidhyantī gātrāṇi ca vidhunvatī॥

‘वह मानिनी देवी ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण’ की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीर के अवयवों को कम्पित करती हुई छटपटा रही थी

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॥ ४ · ५८ · १७ ॥
सूर्यप्रभेव शैलाग्रे तस्याः कौशेयमुत्तमम्। असिते राक्षसे भाति यथा वा तडिदम्बुदे॥

sūryaprabheva śailāgre tasyāḥ kauśeyamuttamam।
asite rākṣase bhāti yathā vā taḍidambude॥

‘उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचल के शिखर पर फैली हुई सूर्य की प्रभा के समान सुशोभित होता था। वह उस काले राक्षस के समीप बादलों में चमकती हुई बिजली के समान प्रकाशित हो रही थी

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॥ ४ · ५८ · १८ ॥
तां तु सीतामहं मन्ये रामस्य परिकीर्तनात्। श्रूयतां मे कथयतो निलयं तस्य रक्षसः॥

tāṁ tu sītāmahaṁ manye rāmasya parikīrtanāt।
śrūyatāṁ me kathayato nilayaṁ tasya rakṣasaḥ॥

‘श्रीराम का नाम लेने से मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षस के घर का पता बताता हूँ, सुनो

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॥ ४ · ५८ · १९ ॥
पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च। अध्यास्ते नगरीं लङ्कां रावणो नाम राक्षसः॥

putro viśravasaḥ sākṣād bhrātā vaiśravaṇasya ca।
adhyāste nagarīṁ laṅkāṁ rāvaṇo nāma rākṣasaḥ॥

‘रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और साक्षात् कुबेर का भाई है। वह लङ्का नामवाली नगरी में निवास करता है

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॥ ४ · ५८ · २० ॥
इतो द्वीपे समुद्रस्य सम्पूर्णे शतयोजने। तस्मिँल्लङ्का पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा॥

ito dvīpe samudrasya sampūrṇe śatayojane।
tasmim̐llaṅkā purī ramyā nirmitā viśvakarmaṇā॥

‘यहाँ से पूरे चार सौ कोस के अन्तर पर समुद्र में एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरी का निर्माण किया है

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॥ ४ · ५८ · २१ ॥
जाम्बूनदमयैर्द्वारैश्चित्रैः काञ्चनवेदिकैः। प्रासादैर्हेमवर्णैश्च महद्भिः सुसमाकृता॥

jāmbūnadamayairdvāraiścitraiḥ kāñcanavedikaiḥ।
prāsādairhemavarṇaiśca mahadbhiḥ susamākṛtā॥

‘उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्ण के बने हुए हैं। उनके भीतर सोने के चबूतरे या वेदियाँ हैं

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॥ ४ · ५८ · २२ ॥
प्राकारेणार्कवर्णेन महता समन्विता। तस्यां वसति वैदेही दीना कौशेयवासिनी॥

prākāreṇārkavarṇena mahatā ca samanvitā।
tasyāṁ vasati vaidehī dīnā kauśeyavāsinī॥

‘उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्य की भाँति चमकती रहती है। उसीके भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दुःख से निवास करती हैं

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॥ ४ · ५८ · २३ ॥
रावणान्तःपुरे रुद्धा राक्षसीभिः सुरक्षिता। जनकस्यात्मजां राज्ञस्तस्यां द्रक्ष्यथ मैथिलीम्॥

rāvaṇāntaḥpure ruddhā rākṣasībhiḥ surakṣitā।
janakasyātmajāṁ rājñastasyāṁ drakṣyatha maithilīm॥

‘रावण के अन्तःपुर में नजरबंद हैं। बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरे पर तैनात हैं। वहाँ पहुँचने पर तुमलोग राजा जनक की कन्या मैथिली सीता को देख सकोगे

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॥ ४ · ५८ · २४ ॥
लङ्कायामथ गुप्तायां सागरेण समन्ततः। सम्प्राप्य सागरस्यान्तं सम्पूर्णं शतयोजनम्॥

laṅkāyāmatha guptāyāṁ sāgareṇa samantataḥ।
samprāpya sāgarasyāntaṁ sampūrṇaṁ śatayojanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५८ · २५ ॥
आसाद्य दक्षिणं तीरं ततो द्रक्ष्यथ रावणम्। तत्रैव त्वरिताः क्षिप्रं विक्रमध्वं प्लवङ्गमाः॥

āsādya dakṣiṇaṁ tīraṁ tato drakṣyatha rāvaṇam।
tatraiva tvaritāḥ kṣipraṁ vikramadhvaṁ plavaṅgamāḥ॥

॥ २४–२५ ॥

‘लङ्का चारों ओर से समुद्र के द्वारा सुरक्षित है। पूरे सौ योजन समुद्र को पार करके उसके दक्षिण तट पर पहुँचने पर तुमलोग रावण को देख सकोगे। अतः वानरो! समुद्र को पार करने में ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रम का परिचय दो

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॥ ४ · ५८ · २६ ॥
ज्ञानेन खलु पश्यामि दृष्ट्वा प्रत्यागमिष्यथ। आद्यः पन्थाः कुलिङ्गानां ये चान्ये धान्यजीविनः॥

jñānena khalu paśyāmi dṛṣṭvā pratyāgamiṣyatha।
ādyaḥ panthāḥ kuliṅgānāṁ ye cānye dhānyajīvinaḥ॥

‘निश्चय ही मैं ज्ञानदृष्टि से देखता हूँ। तुमलोग सीता का दर्शन करके लौट आओगे। आकाश का पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खानेवाले कबूतर आदि पक्षियों का है

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॥ ४ · ५८ · २७ ॥
द्वितीयो बलिभोजानां ये वृक्षफलाशनाः। भासास्तृतीयं गच्छन्ति क्रौञ्चाश्च कुररैः सह॥

dvitīyo balibhojānāṁ ye ca vṛkṣaphalāśanāḥ।
bhāsāstṛtīyaṁ gacchanti krauñcāśca kuraraiḥ saha॥

‘उससे ऊपर का दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षों के फल खाकर रहनेवाले दूसरे-दूसरे पक्षियों का है। उससे भी ऊँचा जो आकाश का तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं

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॥ ४ · ५८ · २८ ॥
श्येनाश्चतुर्थं गच्छन्ति गृध्रा गच्छन्ति पञ्चमम्। बलवीर्योपपन्नानां रूपयौवनशालिनाम्॥

śyenāścaturthaṁ gacchanti gṛdhrā gacchanti pañcamam।
balavīryopapannānāṁ rūpayauvanaśālinām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५८ · २९ ॥
षष्ठस्तु पन्था हंसानां वैनतेयगतिः परा। वैनतेयाच्च नो जन्म सर्वेषां वानरर्षभाः॥

ṣaṣṭhastu panthā haṁsānāṁ vainateyagatiḥ parā।
vainateyācca no janma sarveṣāṁ vānararṣabhāḥ॥

॥ २८–२९ ॥

‘बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्ग से उड़ते हैं। रूप, बल और पराक्रम से सम्पन्न तथा यौवन से सुशोभित होनेवाले हंसों का छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़ की है। वानरशिरोमणियो! हम सबका जन्म गरुड़ से ही हुआ है

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॥ ४ · ५८ · ३० ॥
गर्हितं तु कृतं कर्म येन स्म पिशिताशिनः। प्रतिकार्यं मे तस्य वैरं भ्रातृकृतं भवेत्॥

garhitaṁ tu kṛtaṁ karma yena sma piśitāśinaḥ।
pratikāryaṁ ca me tasya vairaṁ bhrātṛkṛtaṁ bhavet॥

‘परंतु पूर्वजन्म में हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है। तुमलोगों की सहायता करके मुझे रावण से अपने भाई के वैर का बदला लेना है

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॥ ४ · ५८ · ३१ ॥
इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकीं तथा। अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा॥

ihastho'haṁ prapaśyāmi rāvaṇaṁ jānakīṁ tathā।
asmākamapi sauparṇaṁ divyaṁ cakṣurbalaṁ tathā॥

‘मैं यहीं से रावण और जानकी को देखता हूँ। हमलोगों में भी गरुड़ की भाँति दूरतक देखने की दिव्य शक्ति है

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॥ ४ · ५८ · ३२ ॥
तस्मादाहारवीर्येण निसर्गेण वानराः। आयोजनशतात् साग्राद् वयं पश्याम नित्यशः॥

tasmādāhāravīryeṇa nisargeṇa ca vānarāḥ।
āyojanaśatāt sāgrād vayaṁ paśyāma nityaśaḥ॥

‘इसलिये वानरो! हम भोजनजनित बल से तथा स्वाभाविक शक्ति से भी सदा सौ योजन और उससे आगेतक भी देख सकते हैं

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॥ ४ · ५८ · ३३ ॥
अस्माकं विहिता वृत्तिर्निसर्गेण दूरतः। विहिता वृक्षमूले तु वृत्तिश्चरणयोधिनाम्॥

asmākaṁ vihitā vṛttirnisargeṇa ca dūrataḥ।
vihitā vṛkṣamūle tu vṛttiścaraṇayodhinām॥

‘जातीय स्वभाव के अनुसार हमलोगों की जीविका-वृत्ति दूर से देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेष के द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्ष की जड़तक ही सीमित है—वे वहींतक उपलब्ध होनेवाली वस्तु से जीवन-निर्वाह करते हैं

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॥ ४ · ५८ · ३४ ॥
उपायो दृश्यतां कश्चिल्लङ्घने लवणाम्भसः। अभिगम्य तु वैदेहीं समृद्धार्था गमिष्यथ॥

upāyo dṛśyatāṁ kaścillaṅghane lavaṇāmbhasaḥ।
abhigamya tu vaidehīṁ samṛddhārthā gamiṣyatha॥

‘अब तुम इस खारे पानी के समुद्र को लाँघने का कोई उपाय सोचो। विदेहकुमारी सीता के पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरी को लौटोगे

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॥ ४ · ५८ · ३५ ॥
समुद्रं नेतुमिच्छामि भवद्भिर्वरुणालयम्। प्रदास्याम्युदकं भ्रातुः स्वर्गतस्य महात्मनः॥

samudraṁ netumicchāmi bhavadbhirvaruṇālayam।
pradāsyāmyudakaṁ bhrātuḥ svargatasya mahātmanaḥ॥

‘अब मैं तुम्हारी सहायता से समुद्र के किनारे चलना चाहता हूँ। वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायु को जलाञ्जलि प्रदान करूँगा’

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॥ ४ · ५८ · ३६ ॥
ततो नीत्वा तु तं देशं तीरे नदनदीपतेः। निर्दग्धपक्षं सम्पातिं वानराः सुमहौजसः॥

tato nītvā tu taṁ deśaṁ tīre nadanadīpateḥ।
nirdagdhapakṣaṁ sampātiṁ vānarāḥ sumahaujasaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५८ · ३७ ॥
तं पुनः प्रापयित्वा तं देशं पतगेश्वरम्। बभूवुर्वानरा हृष्टाः प्रवृत्तिमुपलभ्य ते॥

taṁ punaḥ prāpayitvā ca taṁ deśaṁ patageśvaram।
babhūvurvānarā hṛṣṭāḥ pravṛttimupalabhya te॥

॥ ३६–३७ ॥

यह सुनकर महापराक्रमी वानरों ने जले पंखवाले पक्षिराज सम्पाति को उठाकर समुद्र के किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देने के पश्चात् वे पुनः उनको वहाँ से उठाकर उनके रहने के स्थान पर ले आये। उनके मुख से सीता का समाचार जानकर उन सभी वानरों को बड़ी प्रसन्नता हुई

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८ ॥